इठलाती इतराती
मदमस्त गुनगुनाती
फूलों से रंग चुराकर
इन्द्रधनुष बिखराती
ओस के मोती समेट
बन मृग त्रिश्ना, मीलों फैल जाती
सीप की चादर ओढ़े
लहरों के गान की नक़ल उतारती
बारिश की ऊँगली थामे
प्यासी धरती में खो जाती
फिर रच कर कोई खेल
सौंधी खुशबू सी उठ जाती
माँ के आँचल में लहराती
बन किलकारी गूँज जाती
तितली पर हो सवार
तरसाती, ललचाती और लुभाती
झूमती नाचती
मुट्ठी से फिसल जाती
बन एहसास , आँखों में चमचमाती
ख़ुशी तू कितनो को दीवाना बनाती
एक पल दौड़ती आती
अगले ही पल छू हो जाती
इठलाती इतराती
मदमस्त गुनगुनाती
फूलों से रंग चुराकर
इन्द्रधनुष बिखराती !
Nicely composed n kudos for using Hindi language :)
ReplyDeleteBade Dino baad jaan pehchan ke logon se itni achhi poem composition suni hai.
:)You too, pick up the pen :)
ReplyDelete