Sunday, July 28, 2013

ख़ुशी

इठलाती इतराती
मदमस्त गुनगुनाती
फूलों से रंग चुराकर
इन्द्रधनुष बिखराती
ओस के मोती समेट
बन मृग त्रिश्ना, मीलों फैल जाती
सीप की चादर ओढ़े 
लहरों के गान की  नक़ल उतारती
बारिश की ऊँगली थामे
प्यासी धरती में खो जाती
फिर रच कर कोई खेल
सौंधी खुशबू सी उठ जाती
माँ के आँचल में लहराती
बन किलकारी गूँज जाती
तितली पर हो सवार  
तरसाती,  ललचाती और लुभाती 
झूमती नाचती
मुट्ठी से फिसल जाती
बन एहसास , आँखों में चमचमाती
ख़ुशी तू कितनो को दीवाना बनाती
एक पल  दौड़ती आती
अगले  ही पल छू हो जाती
इठलाती इतराती
मदमस्त गुनगुनाती
फूलों से रंग चुराकर
इन्द्रधनुष बिखराती !